विग्रह
उनकी कथा के विग्रह
ब्रजाचार्य श्री नारायण भट्ट जी की कथा चार विग्रहों के साथ चलती है: गोदावरी पर मिले लाड़ले ठाकुर, ऊंचागांव में धरती से निकले बलदेव जी और रेवती जी, ब्रह्मांचल पर्वत पर प्रकट हुए लाड़िलीलाल, और संकेत के राधारमण जी।
एक समयरेखा
गोदावरी से संकेत तक
जिस क्रम में ये विग्रह उनके जीवन में आए।
संवत 1600 (1543), गोदावरी
लाडिलेय, यानी लाड़ले ठाकुर
उनके अपने ठाकुर। बारह वर्ष की आयु में गोदावरी पर कृष्ण ने उन्हें अपना बाल स्वरूप दिया। ब्रज के रास्ते में वह बालक उनकी गोद में बैठता और कोमल पैरों से उनके आगे चलता, और चरितामृत कहता है कि लुप्त लीला स्थल प्रकट करते समय भी वे साथ रहे और प्रसन्न होकर अपने स्थल उन्हें सौंपते गए। आज वे ऊंचागांव के दाऊजी मंदिर में विराजते बताए जाते हैं, और कार्तिक पूर्णिमा पर उन्हीं के साथ अष्ट सखी परिक्रमा होती है।
मत्स्वरूपं लाडिलेयंते दास्ये बालरूपिणम्
चरितामृत 2.26संवत 1612 (1555), ऊंचागांव
बलदेव जी और रेवती जी
एक श्रावण की दोपहर एक गाय वन में एक गोरे बालक को दूध पिलाने लगी, और वे समझ गए कि यह बलदेव जी हैं। रात को सपने में बालक ने बताया कि उसकी मूर्ति धरती के नीचे है; सुबह ब्रजवासियों ने खोदकर उसे निकाला, और पहला अभिषेक श्रावण शुक्ल 5 को हुआ। अंतिम सीख में उन्होंने पुत्र दामोदर जी से कहा कि बलदेव जी को इष्ट मानकर सेवो, और लाडिलेय को उन्हीं के पास रखो। दाऊजी का प्राकट्योत्सव आज भी नाग पंचमी को मनता है।
रेवतीसहितं देवंवन्देऽहं च हलायुधम्
ब्रज भक्ति विलास 1.1संवत 1626 (1569), ब्रह्मांचल पर्वत
लाड़िलीलाल, बरसाना
उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर राधा जी ने उन्हें नन्ही बालिका के रूप में दर्शन दिए, और आधी रात के बाद युगल विग्रह उन्हें प्राप्त हुए। नाम उन्होंने दिया: लाड़िलीलाल। सेवा उन्होंने अपने शिष्य नारायणदास जी को सौंपी, और यही आज का श्री लाडली जी मंदिर है।

संकेत
राधारमण जी
संकेत, जहाँ राधा कृष्ण मिलते थे, उन्होंने प्रकट किया। वहाँ राधारमण जी के कहने पर उन्होंने रास पंचाध्यायी गाई और भागवत की टीका रसिकाह्लादिनी लिखी। राधारमण जी का प्राकट्य भी उन्हीं से जोड़ा जाता है।

दर्शन कहाँ करें
- ऊंचागांव का दाऊजी मंदिर: बलदेव जी, रेवती जी, और लाड़ले ठाकुर।
- बरसाना में ब्रह्मांचल पर्वत पर श्री लाडली जी का मंदिर: लाड़िलीलाल।
ब्रज की झलक
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