ब्रजाचार्य श्री नारायण भट्ट जी
उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर श्री राधा रानी ने उन्हें अपना विग्रह दिया। उन्होंने नाम रखा लाडली
सोलहवीं सदी में उन्होंने ब्रज के लुप्त वन, कुंड और लीला स्थल फिर से प्रकट किए। उनकी परंपरा आज भी बरसाना और ऊंचागांव में सेवा करती है।

श्री लाडली जी
बरसाना के श्री लाडली जी मंदिर की परंपरा उन्हीं से शुरू होती है, और युगल को लाड़िलीलाल नाम भी उन्हीं का दिया हुआ है।
ब्रज का नक्शा
1552 में ब्रज भक्ति विलास: 137 वन और 16 वट, हर एक की परिक्रमा के साथ। ब्रज की सबसे पुरानी यात्रा सूची।
रास और उत्सव
रास का मंचन, भादों की बूढ़ी लीला, राधाष्टमी की भोर की पूजा: ब्रज के कई उत्सव उनकी लिखी विधि पर चलते हैं।
470 वर्ष की परंपरा
उनके वंशज आज भी ऊंचागांव में हैं, और श्री लाडली जी मंदिर की राधाष्टमी पूजा उन्हीं की परंपरा से शुरू होती है।
तपस्या, कृपा और नाम
उन्होंने नाम दिया: लाड़िलीलाल
ब्रह्मांचल पर्वत पर वे गोपी भाव में तपस्या करते हुए विचरते थे। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर राधा जी उन्हें नन्ही बालिका के रूप में, लाल जी के साथ चलती हुई, दिखीं और बोलीं: आधी रात के बाद यहाँ आना, मेरा विग्रह तुम्हें यहीं मिलेगा। उसी रात युगल विग्रह रूप में उन्हें प्राप्त हुए, और अगला ही श्लोक बताता है कि नाम कहाँ से आया:
माता पिता दोनों की लाड़ली होने से राधा 'लाड़िली' कहलाती हैं; ससुराल में लोग कृष्ण को 'लाल' कहते हैं। और भट्ट जी ने युगल को नाम दिया: लाड़िलीलाल।
श्री नारायण भट्ट चरितामृत 3.41 से 42
इसी नाम से ब्रजवासी बरसाना के मंदिर को लाडली जी का मंदिर कहते हैं, और मंदिर स्वयं इस प्राकट्य का उत्सव श्री लाड़लीलाल जू विग्रह प्राकट्य महोत्सव के नाम से मनाता है।

लाडली जी के अलावा
उन्होंने और क्या किया
आज ब्रज में तीर्थयात्री जो देखते और करते हैं, उसका बड़ा हिस्सा उन्हीं का रखा हुआ है।

ब्रज की लीला स्थलियाँ फिर से प्रकट कीं
वराह पुराण में बताए मथुरा मंडल के गुप्त स्थल उन्होंने फिर से प्रकट किए, और सारी पृथ्वी ने उन्हें जाना।

ब्रज भक्ति विलास लिखा
संवत 1609 (1552/53) में राधाकुंड पर पूरा हुआ। 137 वन और 16 वट, हर एक की परिक्रमा की लंबाई के साथ।

वन यात्रा लिखी
जन्माष्टमी से भादों पूर्णिमा तक 23 दिन की वन यात्रा, जिसे ब्रज की सबसे पुरानी यात्रा सूची माना जाता है।

रास लीला का मंचन कराया
ब्रज के बालकों को राधा, कृष्ण और सखियों का वेश दिया, और हर लीला उसी स्थान और तिथि पर कराई। सोलहवीं सदी में रास को रूप देने वालों में वे सबसे आगे थे।

बूढ़ी लीला का पंचांग लिखा
उनकी ब्रजोत्सव चंद्रिका भादों में बरसाना के आसपास की लीलाएँ दिन दिन लिखती है। बूढ़ी लीला आज भी उन्हीं स्थलों पर खेली जाती है।
दाऊजी और रेवती जी को ऊंचागांव में प्रतिष्ठित किया
सपने के संकेत पर गांव वालों ने खोदकर बलदेव जी का विग्रह निकाला। पहला अभिषेक श्रावण शुक्ल 5, संवत 1612 (1555) को हुआ।
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लाडली जी की सेवा सौंपी
सेवा उन्होंने बरसाना के अपने शिष्य नारायणदास श्रोत्रिय को दी। बरसाना के गोस्वामी उन्हीं के वंशज हैं।
- राधया सहितंकृष्णं लाडिलेयंस्वभीष्टकम्
लगभग साठ ग्रंथ लिखे
उनमें से आठ आज छपे हुए मिलते हैं, सब संस्कृत में, और सब ऑनलाइन पढ़े जा सकते हैं।
चार सदियों की गवाही
परिवार के ग्रंथों से बाहर के लोग, अपने अपने समय में, उनके काम के बारे में क्या लिखते हैं।
- लगभग 1600नाभादास जी, श्री भक्तमाल
ते किये नारायन प्रगट प्रसिध पृथ्वी में जाने
वराह पुराण के बताए मथुरा मंडल के गुप्त स्थल नारायण भट्ट जी ने प्रकट किए, और सारी पृथ्वी ने उन्हें जाना।
- 1712प्रियादास जी, भक्तिरसबोधिनी
ठौर ठौर रास के बिलास लै प्रकास किये
जगह जगह उन्होंने रास का आनंद प्रकट किया।
- 1883एफ़. एस. ग्राउज़, मथुरा के कलेक्टर
it was from him that every lake and grove in the circuit of Braj received a distinctive name
ब्रज के घेरे की हर झील और हर कुंज को अलग नाम उन्हीं से मिला।
- 1987ए. डब्ल्यू. एंटविसल, ब्रज पर सबसे विस्तृत शोध
the first person to draw up a detailed itinerary
ब्रज की पवित्र परिक्रमा की विस्तृत यात्रा सूची बनाने वाले पहले व्यक्ति।
जीवन के छह पड़ाव
- 1531गोदावरी तट पर जन्म
1545राधाकुंड पहुँचे
1552/53ब्रज भक्ति विलास- 1555ऊंचागांव में बलदेव जी
1569बरसाना में लाडली जी
वर्ष xxxxxxx२वामन द्वादशी को देह त्याग
मंदिर श्री लाडली जी का प्राकट्य उत्सव हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को मनाता है।
उनकी परंपरा आज
गोस्वामी श्री कृष्णानंद भट्ट जी महाराज
उपाधि: xxxxxxx३
नारायण भट्ट जी के वंशज आज भी ऊंचागांव में रहते हैं। उनका वचन था कि नारायणदास जी के पुत्र उनके पुत्र दामोदर जी के शिष्य होंगे, और परिवार कहता है कि बरसाना के सेवायत गोस्वामी आज भी इसी कुल से दीक्षा लेते हैं।
राधाष्टमी 2026 की भोर में, पट खुलने से पहले, गर्भगृह की पहली पूजा उन्होंने की।

ऊंचागांव आएँ
बरसाना से लगभग एक मील पश्चिम में ऊंचागांव है, जिसे उनके ग्रंथ ललिताग्राम, यानी ललिता सखी का गांव, कहते हैं। यहाँ उनकी समाधि है, पास में दाऊजी और रेवती जी का मंदिर, और पहाड़ी पर ललिता जी का मंदिर।

कार्तिक के 30 दिन, 30 स्थल
26 अक्टूबर से 24 नवंबर तक हर दिन एक स्थल, जिसे उन्होंने प्रकट किया या जिससे उनकी कथा जुड़ी है।
2031 की ओर
नृसिंह चतुर्दशी 2031 को उनकी 500वीं जयंती है, अब से 5 वर्ष बाद।
- कार्तिक के 30 स्थल शुरू 26 अक्टूबर 2026
- कार्तिक पूर्णिमा, अष्ट सखी परिक्रमा 24 नवंबर 2026
- नृसिंह चतुर्दशी, उनकी जयंती 18 मई 2027
- नाग पंचमी, दाऊजी का प्राकट्योत्सव 6 अगस्त 2027
- ललिता जन्मोत्सव, ऊंचागांव 6 सितंबर 2027
- राधाष्टमी 8 सितंबर 2027
- वामन द्वादशी, ललिता जी का ब्याह 12 सितंबर 2027
किसी को उनकी कथा भेजनी हो तो: